RBSE Class 12th 2019 Philosophy-SS-85-2019 Previous Year Papers
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Paper details
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| Board | RBSE |
|---|---|
| Class | Class 12th |
| Exam year | 2019 |
| Subject | Philosophy-SS-85-2019 |
| Resource type | Previous Year Papers |
| Category | RBSE Previous Year Question Papers |
| Website | RBSE Solution |
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RBSE Class 12th 2019 Philosophy-SS-85-2019
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Rajasthan Board Class 12th Philosophy-SS-85-2019 2019 solved Previous Year Question Papers
उच्च माध्यमिक परीक्षा, 2019
SENIOR SECONDARY EXAMINATION, 2019
SS-85-PHILOSOPHY
दर्शनशास्त्र / PHILOSOPHY
समय : 3¼ घण्टे पूर्णांक : 80
परीक्षार्थियों के लिए सामान्य निर्देश :
GENERAL INSTRUCTIONS TO THE EXAMINEES :
- परीक्षार्थी सर्वप्रथम अपने प्रश्न पत्र पर नामांक अनिवार्यतः लिखें।
Candidate must write first his/her Roll No. on the question paper compulsorily. - सभी प्रश्न करने अनिवार्य हैं।
All the questions are compulsory. - प्रत्येक प्रश्न का उत्तर दी गई उत्तर-पुस्तिका में ही लिखें।
Write the answer to each question in the given answer-book only. - जिन प्रश्नों में आन्तरिक खण्ड हैं, उन सभी के उत्तर एक साथ ही लिखें।
For questions having more than one part the answers to those parts are to be written together in continuity.
SLNo. : No. of Questions - 30 No. of Printed Pages — 7
नामांक Roll No.
SS-85-Philosophy
खण्ड - अ / SECTION - A
निम्नलिखित में से प्रत्येक को परिभाषित कीजिये।
Define each of the following.
-
संचित कर्म (Sanchit Karma)
उत्तर / Answer: संचित कर्म का अर्थ है वे सभी कर्म जो पिछले जन्मों में किए गए हैं और जिनका फल अभी भोगा नहीं गया है। ये कर्म संचित रहते हैं और भविष्य में फल देने के लिए तैयार रहते हैं।
Sanchit Karma refers to all those actions performed in past lives whose results have not yet been experienced. These karmas are accumulated and remain ready to bear fruit in the future.
-
उपनिषद् (Upanishad)
उत्तर / Answer: उपनिषद् वेदों के अंतिम भाग हैं, जिनमें ब्रह्म और आत्मा के स्वरूप, ज्ञान, मोक्ष आदि दार्शनिक विषयों पर विचार किया गया है। ये भारतीय दर्शन के आधार स्तंभ माने जाते हैं।
Upanishads are the concluding parts of the Vedas, which discuss philosophical topics such as the nature of Brahman and Atman, knowledge, and liberation. They are considered the foundation of Indian philosophy.
नोट / Note: प्रश्न पत्र के हिन्दी व अंग्रेजी रूपान्तर में किसी प्रकार की त्रुटि / अन्तर / विरोधाभास होने पर हिन्दी भाषा के प्रश्न को सही मानें ।
If there is any error / difference / contradiction in Hindi & English versions of the question paper, the question of Hindi version should be treated valid.
| खण्ड / Section | प्रश्न संख्या / Q. Nos. | अंक प्रति प्रश्न / Marks per question | उत्तर की शब्द सीमा / Word limit of answer |
|---|---|---|---|
| अ / A | 1 | 1 | 20 शब्द / 20 words |
| ब / B | 1-20 | 2 | 50 शब्द / 50 words |
| स / C | 21-30 | 5 | 100-150 शब्द / 100-150 words |
प्रश्न संख्या 2 से 30 तक में आन्तरिक विकल्प हैं।
There are internal choices for Q. Nos. 2 to 30.
SS-85-Philosophy 338
प्रश्न पत्र – दर्शनशास्त्र (Philosophy) – SS-85
निम्नलिखित शब्दों को स्पष्ट कीजिए (Explain the following terms):
-
उपादान (Upadana)
उपादान का अर्थ है 'कारण' या 'आधार'। यह बौद्ध दर्शन में पाँच स्कन्धों में से एक है, जो भौतिक और मानसिक तत्त्वों के समूह को दर्शाता है। यह जीवन के अस्तित्व के लिए आवश्यक कारण सामग्री है।
-
प्रत्याहार (Pratyahara)
प्रत्याहार योग के आठ अंगों में से पाँचवाँ अंग है। इसका अर्थ है इंद्रियों को बाह्य विषयों से हटाकर मन के नियंत्रण में लाना। यह ध्यान और एकाग्रता की तैयारी का चरण है।
-
सौन्दर्य-शास्त्र (Aesthetics)
सौन्दर्य-शास्त्र दर्शन की वह शाखा है जो सौन्दर्य, कला और रस के स्वरूप का अध्ययन करती है। यह भारतीय दर्शन में 'रस' सिद्धांत और पाश्चात्य दर्शन में 'ब्यूटी' की अवधारणा पर केंद्रित है।
-
रिलीजन (Religion)
रिलीजन (धर्म) मानव जीवन का वह आयाम है जो ईश्वर, आत्मा, नैतिकता और मोक्ष जैसे विषयों से संबंधित है। यह विश्वास, आचार और अनुष्ठानों की एक प्रणाली है जो मनुष्य को परम सत्य से जोड़ती है।
-
पुरूषार्थ (Purushartha)
पुरूषार्थ भारतीय दर्शन में मानव जीवन के चार मुख्य लक्ष्य हैं – धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष। ये जीवन के उद्देश्यों को प्राप्त करने के साधन हैं, जिनमें मोक्ष सर्वोच्च है।
-
कैथोलिक (Catholic)
कैथोलिक ईसाई धर्म की एक प्रमुख शाखा है, जो रोमन कैथोलिक चर्च से संबंधित है। यह पोप के नेतृत्व में सार्वभौमिक चर्च की अवधारणा पर आधारित है और इसके सिद्धांत बाइबिल और परंपरा पर आधारित हैं।
-
गुरू ग्रन्थ साहिब (Guru Granth Sahib)
गुरू ग्रन्थ साहिब सिख धर्म का केंद्रीय धार्मिक ग्रंथ है। इसे सिखों द्वारा जीवित गुरु माना जाता है। इसमें सिख गुरुओं और अन्य संतों की वाणी संकलित है, जो एकेश्वरवाद, भक्ति और समानता पर बल देती है।
-
सम्यक स्मृति (Samyak Smriti)
सम्यक स्मृति बौद्ध अष्टांगिक मार्ग का सातवाँ अंग है। इसका अर्थ है सही स्मृति या सजगता। यह वर्तमान क्षण के प्रति पूर्ण जागरूकता और ध्यान की स्थिति है, जो मन को भटकने से रोकती है और आध्यात्मिक विकास में सहायक होती है।
SS-85-Philosophy
खण्ड - ब
SECTION - B
-
आस्तिक एवं नास्तिक दर्शन के बीच अन्तर स्पष्ट कीजिए।
Explain the difference between the theist (Aastik) and atheist (Nastik) Philosophy.उत्तर: आस्तिक दर्शन ईश्वर के अस्तित्व को स्वीकार करता है, जबकि नास्तिक दर्शन ईश्वर के अस्तित्व को नकारता है। आस्तिक दर्शन वेदों की प्रामाणिकता मानता है (जैसे- न्याय, वैशेषिक, सांख्य, योग, मीमांसा, वेदांत), जबकि नास्तिक दर्शन वेदों को प्रमाण नहीं मानता (जैसे- चार्वाक, बौद्ध, जैन)। आस्तिक दर्शन आत्मा और परमात्मा में विश्वास करता है, जबकि नास्तिक दर्शन इसे भ्रम मानता है।
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उपनिषदों के अनुसार ब्रह्म के स्वरूप का वर्णन करें।
Describe the nature of "Brahman" according to Upanishads.उत्तर: उपनिषदों के अनुसार ब्रह्म सत्य, ज्ञान और आनंद स्वरूप है। यह निराकार, निर्गुण, अद्वितीय, अविनाशी और सर्वव्यापी है। ब्रह्म सभी प्राणियों में समान रूप से विद्यमान है। यह इंद्रियों और मन से परे है, केवल ज्ञान द्वारा अनुभव किया जा सकता है। ब्रह्म ही सृष्टि का मूल कारण है और सब कुछ उसी से उत्पन्न होता है।
-
बौद्ध तथा जैन दर्शन के नैतिक सिद्धान्तों की समानता को बतायें।
Describe the similarity of the moral principles of Buddhist and Jain Philosophy.उत्तर: बौद्ध और जैन दर्शन के नैतिक सिद्धांतों में अनेक समानताएँ हैं। दोनों ही अहिंसा (non-violence) को सर्वोच्च नैतिक सिद्धांत मानते हैं। दोनों सत्य, अस्तेय (चोरी न करना), ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह (संग्रह न करना) पर बल देते हैं। दोनों ही कर्म सिद्धांत और पुनर्जन्म में विश्वास करते हैं। दोनों का लक्ष्य मोक्ष/निर्वाण प्राप्त करना है। दोनों ही संसार को दुखमय मानते हैं और उससे मुक्ति का मार्ग बताते हैं।
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स्वामी विवेकानन्द के मतानुसार मनुष्य के स्वरूप की व्याख्या कीजिए।
Explain the nature of Man According to Swami Vivekanand.उत्तर: स्वामी विवेकानन्द के अनुसार मनुष्य का वास्तविक स्वरूप दिव्य और आध्यात्मिक है। मनुष्य केवल शरीर और मन नहीं है, बल्कि वह आत्मा है जो अमर, शुद्ध और सर्वज्ञ है। प्रत्येक मनुष्य में ईश्वरत्व निहित है। मनुष्य का लक्ष्य अपनी इस दिव्यता को प्रकट करना है। वे मनुष्य को शक्ति, साहस और आत्मविश्वास का प्रतीक मानते थे। उन्होंने कहा कि मनुष्य स्वयं अपने भाग्य का निर्माता है।
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पाश्चात्य दर्शन की विभिन्न ज्ञानमीमांसीय अवधारणाओं को स्पष्ट करें।
Explain the various epistemological theories of Western Philosophy.उत्तर: पाश्चात्य दर्शन में ज्ञानमीमांसा (Epistemology) की प्रमुख अवधारणाएँ हैं: (1) अनुभववाद (Empiricism) - ज्ञान का स्रोत इंद्रिय अनुभव है (लॉक, ह्यूम)। (2) बुद्धिवाद (Rationalism) - ज्ञान का स्रोत तर्क और बुद्धि है (डेकार्ट, स्पिनोज़ा)। (3) समालोचनात्मक दर्शन (Critical Philosophy) - कांट ने अनुभव और तर्क दोनों को मिलाकर ज्ञान की व्याख्या की। (4) प्रत्यक्षवाद (Positivism) - केवल वैज्ञानिक रूप से सत्यापित ज्ञान को ही मान्यता देता है। (5) व्यावहारिकता (Pragmatism) - ज्ञान की सत्यता उसके व्यावहारिक परिणामों पर निर्भर करती है।
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भारतीय परम्परा में धर्म के वर्गीकरण को समझाइये।
Explain the classification of Dharma in Indian tradition.उत्तर: भारतीय परम्परा में धर्म का वर्गीकरण मुख्यतः दो प्रकार से किया गया है: (1) साधारण धर्म (सामान्य धर्म) - ये सभी मनुष्यों के लिए समान नैतिक नियम हैं, जैसे सत्य, अहिंसा, दया, क्षमा, अस्तेय आदि। (2) विशेष धर्म - ये व्यक्ति की जाति, वर्ण, आश्रम और परिस्थिति के अनुसार भिन्न होते हैं, जैसे वर्णाश्रम धर्म, राजधर्म, पुत्र धर्म, पति-पत्नी धर्म आदि। इसके अतिरिक्त, धर्म को आचार, व्यवहार और प्रायश्चित के रूप में भी वर्गीकृत किया गया है।
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हिन्दू धर्म के "कर्म - सिद्धान्त" को स्पष्ट करें।
Explain the "Theory of Karma" according to Hindu Dharma.उत्तर: हिन्दू धर्म का कर्म सिद्धांत बताता है कि प्रत्येक कर्म का फल अवश्य मिलता है। कर्म तीन प्रकार के होते हैं: (1) संचित कर्म - पिछले जन्मों के कर्मों का संग्रह। (2) प्रारब्ध कर्म - वर्तमान जीवन में भोगे जाने वाले कर्म। (3) क्रियमाण कर्म - वर्तमान में किए जा रहे कर्म जो भविष्य को प्रभावित करेंगे। यह सिद्धांत कार्य-कारण के नियम पर आधारित है। अच्छे कर्मों का फल सुख और बुरे कर्मों का फल दुख होता है। मोक्ष प्राप्त करने के लिए कर्मों के बंधन से मुक्त होना आवश्यक है।
-
यहूदी धर्म के नैतिक विचारों को समझाइये।
Explain the moral thoughts of Judaism.उत्तर: यहूदी धर्म के नैतिक विचार मुख्यतः दस आज्ञाओं (Ten Commandments) पर आधारित हैं। इनमें एक ईश्वर में विश्वास, मूर्तिपूजा का निषेध, माता-पिता का सम्मान, हत्या, चोरी, व्यभिचार, झूठी गवाही और लालच का निषेध शामिल है। यहूदी धर्म न्याय, दया, पवित्रता और सामुदायिक कल्याण पर बल देता है। 'तोराह' (Torah) में दिए गए नियमों का पालन करना नैतिक जीवन का आधार है। यहूदी धर्म में 'तिक्कुन ओलम' (दुनिया को सुधारना) की अवधारणा भी महत्वपूर्ण है।
खण्ड - B (Section - B)
9) पारसी धर्म का अशुभ की समस्या पर क्या मत है? स्पष्ट करें।
What is the opinion of Persian religion on the problem of evil? Explain.
पारसी धर्म (ज़ोरोस्ट्रियन धर्म) के अनुसार, संसार में दो मूल शक्तियाँ विद्यमान हैं – अहुरमज़्दा (प्रकाश, सत्य और अच्छाई का देवता) और अहिरमन (अंधकार, झूठ और बुराई का देवता)। अशुभ (बुराई) की समस्या को पारसी धर्म द्वैतवादी दृष्टिकोण से देखता है। बुराई को एक स्वतंत्र सत्ता माना गया है जो अच्छाई के विरुद्ध संघर्ष करती है। मनुष्य का कर्तव्य है कि वह अच्छे विचारों, अच्छे वचनों और अच्छे कर्मों के माध्यम से अहुरमज़्दा का साथ दे और बुराई पर विजय प्राप्त करे। अंततः अच्छाई की जीत होगी और बुराई का विनाश होगा।
20) धार्मिक असहिष्णुता के कारण बताइये।
Explain the causes of religious intolerance.
धार्मिक असहिष्णुता के प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं:
- अज्ञानता और गलत धारणाएँ: अन्य धर्मों के बारे में सही जानकारी का अभाव और भ्रांतियाँ असहिष्णुता को जन्म देती हैं।
- कट्टरता और अंधविश्वास: अपने धर्म को ही एकमात्र सत्य मानना और दूसरों को गलत समझना।
- राजनीतिक और सामाजिक कारण: सत्ता, संसाधनों या सामाजिक प्रभुत्व के लिए धर्म का दुरुपयोग।
- ऐतिहासिक शत्रुता और संघर्ष: अतीत में हुए धार्मिक युद्धों और अत्याचारों की स्मृतियाँ।
- आर्थिक असमानता: गरीबी और बेरोजगारी जैसी समस्याएँ लोगों को धार्मिक असहिष्णुता की ओर धकेलती हैं।
- शिक्षा का अभाव: तर्कसंगत और वैज्ञानिक दृष्टिकोण का न होना।
खण्ड - C (Section - C)
21) भारतीय दर्शन का स्वरूप स्पष्ट करें।
Explain the Nature of Indian Philosophy.
भारतीय दर्शन का स्वरूप निम्नलिखित विशेषताओं द्वारा स्पष्ट किया जा सकता है:
- आध्यात्मिकता: भारतीय दर्शन का मुख्य लक्ष्य आध्यात्मिक मुक्ति (मोक्ष) प्राप्त करना है, न कि केवल भौतिक जगत का ज्ञान।
- व्यावहारिकता: यह केवल सैद्धांतिक नहीं है, बल्कि जीवन जीने की एक कला और मार्गदर्शन प्रदान करता है।
- आस्तिक और नास्तिक दोनों परंपराएँ: इसमें वेदों को मानने वाले (आस्तिक) और न मानने वाले (नास्तिक) दोनों दर्शन शामिल हैं।
- तर्क और अनुभव का समन्वय: भारतीय दर्शन तर्क (युक्ति) और अनुभव (अनुभव) दोनों को महत्व देता है।
- आचार-विचार पर बल: नैतिकता और आचरण को ज्ञान प्राप्ति के लिए आवश्यक माना गया है।
- पुनर्जन्म और कर्म का सिद्धांत: अधिकांश भारतीय दर्शन पुनर्जन्म और कर्म के नियम को स्वीकार करते हैं।
अथवा / OR
चार्वाक की जड़वादी ज्ञानमीमांसा को समझाइये।
Explain the materialistic epistemology of Charvak Philosophy.
चार्वाक दर्शन (लोकायत) एक नास्तिक और भौतिकवादी दर्शन है। इसकी ज्ञानमीमांसा (एपिस्टेमोलॉजी) निम्नलिखित है:
- प्रत्यक्ष ही एकमात्र प्रमाण है: चार्वाक के अनुसार, केवल प्रत्यक्ष (इंद्रियों द्वारा प्राप्त) ज्ञान ही सत्य और विश्वसनीय है। अनुमान, शब्द आदि प्रमाण अविश्वसनीय हैं।
- इंद्रियानुभव पर बल: जो कुछ भी इंद्रियों द्वारा देखा, सुना, छुआ, सूंघा या चखा जा सकता है, वही सत्य है।
- अनुमान का खंडन: चार्वाक अनुमान को प्रमाण नहीं मानते, क्योंकि अनुमान में व्याप्ति (सार्वभौमिक सहचार) का ज्ञान आवश्यक है, जो संभव नहीं है।
- आत्मा और परलोक का निषेध: चूँकि आत्मा और परलोक प्रत्यक्ष नहीं हैं, इसलिए चार्वाक इन्हें अस्वीकार करते हैं। चेतना शरीर का ही एक गुण है।
- भौतिकवादी दृष्टिकोण: जगत चार भूतों (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु) से बना है और इन्हीं के संयोग से चेतना उत्पन्न होती है।
22) श्रीमद्भगवद्गीता की प्रमुख शिक्षा की वर्तमान में प्रासंगिकता पर लेख लिखिए।
Write an essay on relevance of the main teaching of Bhagvatgita in the present time.
श्रीमद्भगवद्गीता की प्रमुख शिक्षाएँ आज के समय में अत्यंत प्रासंगिक हैं। गीता का मुख्य संदेश निष्काम कर्म योग (फल की इच्छा न रखते हुए कर्तव्यपालन) है। वर्तमान समय में इसकी प्रासंगिकता निम्नलिखित है:
- तनाव और अवसाद से मुक्ति: निष्काम कर्म का सिद्धांत मनुष्य को परिणामों की चिंता किए बिना कर्म करने की प्रेरणा देता है, जिससे मानसिक तनाव कम होता है।
- कर्तव्यपरायणता: गीता व्यक्ति को अपने कर्तव्यों का पालन करने की सीख देती है, जो समाज और राष्ट्र के विकास के लिए आवश्यक है।
- समता और संतुलन: सुख-दुख, लाभ-हानि में सम रहने की शिक्षा आज के प्रतिस्पर्धी युग में मानसिक संतुलन बनाए रखने में सहायक है।
- आध्यात्मिक विकास: भौतिकता की अंधी दौड़ में गीता आध्यात्मिक मूल्यों की ओर लौटने का मार्ग दिखाती है।
- नेतृत्व और प्रबंधन: गीता के सिद्धांत आधुनिक प्रबंधन और नेतृत्व में भी उपयोगी हैं, जैसे निर्णय लेना, टीम वर्क और लक्ष्य निर्धारण।
- सामाजिक समरसता: गीता सभी प्राणियों में समान आत्मा देखने की शिक्षा देती है, जो सामाजिक समानता और भाईचारे को बढ़ावा देती है।
इस प्रकार, गीता की शिक्षाएँ आज भी उतनी ही प्रासंगिक हैं जितनी कि महाभारत काल में थीं।
अथवा / OR
उपनिषदों में जीवात्मा के स्वरूप की व्याख्या कीजिए।
Explain the nature of soul according to Upanishads.
उपनिषदों के अनुसार जीवात्मा (आत्मा) का स्वरूप निम्नलिखित है:
- अविनाशी और शाश्वत: आत्मा न जन्मती है, न मरती है। यह अविनाशी, नित्य और शाश्वत है।
- अजन्मा और अमर: आत्मा का न तो जन्म होता है और न ही मृत्यु। शरीर नष्ट होने पर भी आत्मा अमर रहती है।
- चेतन तत्व: आत्मा स्वयं प्रकाशमान चेतना है। यह शरीर, इंद्रियों और मन से भिन्न है।
- सर्वव्यापी और सूक्ष्म: आत्मा सभी प्राणियों में समान रूप से व्याप्त है। यह अत्यंत सूक्ष्म है और इसे इंद्रियों द्वारा नहीं जाना जा सकता।
- ब्रह्म से अभिन्न: उपनिषदों का मूल सिद्धांत है "अहं ब्रह्मास्मि" (मैं ब्रह्म हूँ) और "तत्त्वमसि" (तू वह है)। जीवात्मा और परमात्मा (ब्रह्म) में कोई भेद नहीं है।
- सुख-दुख से परे: आत्मा सुख-दुख, इच्छा-द्वेष आदि से रहित है। यह शुद्ध, बुद्ध और मुक्त स्वभाव की है।
- ज्ञानस्वरूप: आत्मा ज्ञान स्वरूप है। अज्ञान के कारण यह शरीर और संसार से अपना संबंध मान लेती है।
23) प्रतीत्यसमुत्पाद के सिद्धान्त को विस्तार से समझाइये।
Explain in detail The Theory of 'Pratityasamutpada'.
प्रतीत्यसमुत्पाद (आश्रित समुत्पाद) बौद्ध दर्शन का एक मूलभूत सिद्धांत है। इसका अर्थ है "कारणों और परिस्थितियों के आधार पर उत्पन्न होना"। इस सिद्धांत के अनुसार, संसार की कोई भी वस्तु स्वतंत्र रूप से उत्पन्न नहीं होती, बल्कि वह अनेक कारणों और परिस्थितियों पर निर्भर करती है।
प्रतीत्यसमुत्पाद के बारह अंग (द्वादश निदान):
- अविद्या: अज्ञान (सत्य के प्रति अज्ञानता)
- संस्कार: अविद्या के कारण उत्पन्न कर्म-संस्कार
- विज्ञान: संस्कारों के कारण उत्पन्न चेतना
- नाम-रूप: विज्ञान के कारण उत्पन्न मानसिक और शारीरिक अस्तित्व
- षडायतन: नाम-रूप के कारण उत्पन्न छह इंद्रियाँ (आँख, कान, नाक, जीभ, त्वचा, मन)
- स्पर्श: इंद्रियों और विषयों के संयोग से उत्पन्न स्पर्श
- वेदना: स्पर्श से उत्पन्न सुख, दुख या उदासीनता की अनुभूति
- तृष्णा: वेदना से उत्पन्न इच्छा या लालसा
- उपादान: तृष्णा से उत्पन्न आसक्ति या ग्रहण
- भव: उपादान से उत्पन्न पुनर्जन्म की प्रक्रिया
- जाति: भव से उत्पन्न जन्म